"साहित्य की गुमटी" में वर्णित व्यंग्य, व्यंजना, वक्रोक्त्ति, कथ्य, रचनाशिल्प, भाषा और तीखे तेवरों से अभिभूत होने की पूरी गारन्टी है। सुधी पाठक यह संग्रह पढ़ने के बाद व्यंग्य की दुनिया में अपने आप को खोया पायेंगे। ठहाके भी लगायेंगे, विषम परिस्थितियों में चरमराती व्यवस्थाओं पर भृकुटि भी तानेंगे, ऐसा मेरा विश्वास है। एक उच्चकोटि की व्यंग्य रचना से हमारी जो अपेक्षाएँ हो सकती हैं, उस कसौटी पर यह संग्रह खरा उतरता है।
डॉ. कृष्णलता सिंह
'साहित्य की गुमटी' में लेखक धर्मपाल जी ने ईमानदारी को तराजू में तोला है। रचनाओं के माध्यम से व्यंग्य के विधान और विधि का सहज आलंबन लिया है तो व्यंजना की परिधि से कोसों दूर जाकर पुस्तक की रचनाओं को नैसर्गिक प्रवाह में ले जाते हुए हास्य की अकाट्य मिसाल कायम की है। यही नहीं बल्कि सभी रचनाओं में शिल्प और भाषिक नवीनता है। पाठकों को रचनाओं के प्रति उत्साहित व आंदोलित करने का व्यंग्यकार का उद्देश्य इस पुस्तक में सौ प्रतिशत पूरा हुआ है। निश्चित ही पाठकों को लेखक के व्यंग्य बाण प्रफुल्लित करेंगे और प्रस्तुत लालित्य मोहित करेगा। व्यंजना में अभिव्यक्त ये रचनाएँ रसिकों की साहित्यिक कसौटी पर खरी उतरती हुई नजर आती हैं।
आर पी तोमर, समालोचक एवं अंतरराष्ट्रीय पत्रकार
अगर आप उम्दा श्रेणी की साहित्यिक रचनाओं को जो व्यंग्य पर आधारित हैं पढ़ना चाहते हैं, उत्तम कोटि का व्यंग्य तो ‘साहित्य की गुमटी’ को खरीद कर जरूर पढ़ें। ‘साहित्य की गुमटी’ में आपको साहित्यकारों, लेखकों, राजनीति, धर्म, और न केवल कला से जुड़े व्यंग्य मिलेंगे बल्कि अफवाहों पर, अतुल्य भारत पर, जी-20 पर, बजट पर, ट्रिलियन अर्थव्यवस्था पर, हवाई जहाज पर, सभ्य और असभ्य होने पर, राजनेताओं पर, बिटकॉइन पर, लोगों के लालच व संस्कार पर, लोगों की व्यवस्थाओं व घोषणाओं पर, लोगों के वादों पर भी व्यंग्य मिलेंगे। उम्दा कोटि के व्यंग्य संग्रह के प्रकाशन के लिए शिवना प्रकाशन को बहुत-बहुत बधाई।